ग्रंथों में पाप और पुण्य को लेकर कई नियम बताए गए हैं। जो काम करने
योग्य नहीं है, वे ही पाप माने गए है। श्रीरामचरित मानस के किष्किंधा कांड
के एक प्रसंग में श्रीराम ने लक्ष्मण को पाप की परिभाषा बताई है।
इसे तुलसीदासजी ने ऐसे लिखा है कि-
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।।
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।।
इन चौपाइयों का अर्थ यह है कि भौंरों की अनूठी गूंज सुनाई दे रही है
तथा कई प्रकार के सुंदर पक्षी कलरव कर रहे हैं। रात देखकर चकवा वैसे ही
दुखी है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर कोई बुरा व्यक्ति दुखी होता है।
दूसरे की संपत्ति को देखकर बुरे व्यक्ति को जैसा लगता है, वह एक तरह का पाप
है।
कई बार हमें लगता है कि जो कुछ दूसरों के पास है, वह हमारे पास भी
होना चाहिए। इसमें बुराई नहीं है, लेकिन बुराई उसे पाने के लिए किए गए
अनुचित प्रयास में है। जो मिला है, उसमें संतोष करना चाहिए, जो दूसरे को
मिला है, उसमें प्रसन्न होना चाहिए। ईर्ष्या और लोभ आने पर छीनने की वृत्ति
जागती है जो कि पाप है।
पाप के संबंध में श्रीराम कहते हैं कि
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।
इन चौपाइयों का अर्थ यह है कि प्यास के कारण पपीहा उसी तरह व्याकुल
है, जैसे शंकरजी का द्रोही दुखी रहता है। सुख प्राप्त करने के लिए जो खीज,
चिढ़, जो बेचैनी प्राप्त होती है, वह भी एक तरह का पाप है। अंत में शरद ऋतु
के चंद्रमा की शीतलता को संतों से जोड़ते हुए कहते हैं,‘शरद-ऋतु के ताप को
चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं। संत एक
ऐसा नजरिया देते हैं, जिससे हम जान जाते हैं कि पाप क्या है और पुण्य क्या
है। इसलिए यह गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए कि संत के पास या तीर्थ में जाने
से पाप मिट जाएंगे।
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