Tuesday, 22 December 2015

पांडवों की ओर से लड़ा था धृतराष्ट्र का एक पुत्र,दुर्योधन क्यों करना चाहता था आत्महत्या, जानिए



पांडवों की ओर से लड़ा था धृतराष्ट्र का एक पुत्र
जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, तब युधिष्ठिर ने अपने रथ पर खड़े होकर कहा कि कौरव सेना में जो वीर हमारा साथ देना चाहे, मैं उसका स्वागत करने को तैयार हूं। युधिष्ठिर के ऐसा कहने धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु बड़ा प्रसन्न हुआ और कौरव सेना को छोड़ पांडव सेना में शामिल हो गया। युयुत्सु को अपनी सेना में आते देख युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि महाराज धृतराष्ट्र का वंश तुमसे ही चलेगा और तुमसे ही उन्हें पिंड मिलेगा।

दरअसल जिस समय गांधारी गर्भवती थी, उस समय एक वैश्य कन्या धृतराष्ट्र की सेवा कर रही थी, युयुत्सु उसी का पुत्र था। युद्ध के बाद धृतराष्ट्र का सिर्फ यही एक पुत्र जीवित बचा था। राजा बनने के बाद युधिष्ठिर ने युयुत्सु को धृतराष्ट्र की सेवा करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। महाभारत के महाप्रास्थानिक पर्व के अनुसार, अंत समय में जब पांडवों ने हस्तिनापुर का त्याग किया तब उन्होंने परीक्षित को राजा बनाकर युयुत्सु को ही संपूर्ण राज्य की देख-भाल करने के लिए कहा था।


दुर्योधन क्यों करना चाहता था आत्महत्या, जानिए

वनवास के दौरान पांडव काम्यक वन में रह रहे थे। जब यह बात दुर्योधन को पता चली तो शिकार करने के बहाने उसने भी वहीं अपना शिविर बनवा लिया ताकि अपने ठाट-बाट दिखाकर पांडवों को जला सके। यहां किसी बात पर दुर्योधन का गंधर्वों से युद्ध हो गया। गंधर्व दुर्योधन को बंदी बना लेते हैं। गंधर्वों को हराकर पांडव दुर्योधन को छुड़ा लाते हैं। इस घटना से दुर्योधन स्वयं को बहुत अपमानित महसूस करता है और आत्महत्या करने की सोचता है।
आत्महत्या का मन बनाकर दुर्योधन साधुओं के वस्त्र पहन लेता है और अन्न-जल त्याग कर उपवास के नियमों का पालन करने लगता है। यह बात जब पातालवासी दैत्यों को पता चलती है तो वे दुर्योधन को बताते हैं कि तुम्हारी सहायता के लिए अनेक दानव पृथ्वी पर आ चुके हैं। दैत्यों की बात मान कर दुर्योधन आत्महत्या करने का विचार छोड़ देता है और प्रतिज्ञा करता है कि अज्ञातवास समाप्त होते ही वह पांडवों का विनाश कर देगा।

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