धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण
करने वाली धृ धातु से बना हैं। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया
जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक
पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं
मनु स्मृति में धर्म की परिभाषा
धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं
धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं
अर्थात (धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना,
क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न
करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को
वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की
पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ;
ये दस धर्म के लक्षण हैं।)
दूसरे स्थान पर कहा हैं आचार:परमो धर्म
दूसरे स्थान पर कहा हैं आचार:परमो धर्म
अर्थात सदाचार परम धर्म हैं
महाभारत में भी लिखा हैं
धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:
अर्थात जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई हैं वह धर्म हैं।
महाभारत में भी लिखा हैं
धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:
अर्थात जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई हैं वह धर्म हैं।
धर्म क्या है? इसे स्पष्ट करते हुए धर्मग्रंथों में बताया गया है कि प्रभु
की आराधना के साथ जो व्यक्ति दूसरों की सेवा-सहायता करता है और ईमानदारी से
अपना काम करता है, वही धार्मिक कार्य में संलिप्त है। इससे जुड़ी एक कहानी
भक्त जाजलि की है। वह धर्मशास्त्रों के ज्ञाता थे। अधिकांश समय भगवान की
आराधना में लगाते थे। उसके बावजूद सच्चा धर्म क्या है, उनके हृदय में यह
जिज्ञासा बनी रहती थी।
उन्होंने जब अपने गुरु के समक्ष यह जिज्ञासा व्यक्त की, तो गुरुजी ने कहा, जनकपुर में तुलाधार वैश्य नाम का परम भक्त व्यापारी रहता है। वही इसका समाधान कर सकता है।
जाजलि जनकपुर जा पहुंचे। तुलाधार की दुकान पर पहुंचे, तो देखा कि वह ग्राहकों को माल तोलकर दे रहा है। जाजलि ने विनम्रता से पूछा, सेठ जी, आपका गुरु कौन है? धर्म किसे कहते हैं? तुलाधार ने उत्तर दिया, व्यापार ही मेरा गुरु है।
ग्राहकों को ठीक तोलकर माल देना ही मेरा धर्म है। मैं ईमानदारी से किए गए व्यापार कार्य से निवृत्त होने के बाद घर पहुंचकर अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करता हूं, यह मेरी कर्तव्य भावना है। सवेरे शैया त्यागते ही परमात्मा का स्मरण करता हूं। दुकान खोलने से पहले अपनी कमाई का एक अंश गरीबों में वितरित करता हूं। इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता। तुलाधार वैश्य के इन शब्दों ने जाजलि की जिज्ञासा का समाधान कर दिया।
'धर्म' धब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई तुल्य शब्द पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि।
उन्होंने जब अपने गुरु के समक्ष यह जिज्ञासा व्यक्त की, तो गुरुजी ने कहा, जनकपुर में तुलाधार वैश्य नाम का परम भक्त व्यापारी रहता है। वही इसका समाधान कर सकता है।
जाजलि जनकपुर जा पहुंचे। तुलाधार की दुकान पर पहुंचे, तो देखा कि वह ग्राहकों को माल तोलकर दे रहा है। जाजलि ने विनम्रता से पूछा, सेठ जी, आपका गुरु कौन है? धर्म किसे कहते हैं? तुलाधार ने उत्तर दिया, व्यापार ही मेरा गुरु है।
ग्राहकों को ठीक तोलकर माल देना ही मेरा धर्म है। मैं ईमानदारी से किए गए व्यापार कार्य से निवृत्त होने के बाद घर पहुंचकर अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करता हूं, यह मेरी कर्तव्य भावना है। सवेरे शैया त्यागते ही परमात्मा का स्मरण करता हूं। दुकान खोलने से पहले अपनी कमाई का एक अंश गरीबों में वितरित करता हूं। इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता। तुलाधार वैश्य के इन शब्दों ने जाजलि की जिज्ञासा का समाधान कर दिया।
'धर्म' धब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई तुल्य शब्द पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि।
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