असुरो ने आक्रमण कर इंद्र को सत्ताविहीन कर दिया ब्रह्मा के समक्ष जाके इंद्र
ने उनसे मदद मांगी, तब उन्हें उपाय
बताया गया की एक ब्रह्मज्ञानी प्रसन्न करके ही उन्हें इंद्रासन पुनः प्राप्त होगा।
तब इन्द्र एक ऐसे ही व्यक्ति की सेवा में लग गए, परन्तु उसे ये मालूम नहीं था कि वो ब्रह्मज्ञानी एक असुर
माता का पुत्र है और उसके दिल में अपनी माता की जाती के प्रति विशेष सम्मान था।
जब इंद्र को ये पता चला की उसकी सारी
सेवा व्यर्थ ही जा रही है तो उसे क्रोध आ गया और अपने इंद्रासन के मोह में उसने
अपने गुरु (उस ब्रह्मज्ञानी) को मार डाला। एक गुरु की हत्या का पाप इतना भयानक था
की वो पाप एक राक्षस बन इन्द्र के पीछे लग गया, तब इन्द्र एक फूल के अंदर छुप गया और 1 लाख वर्ष तक भगवान विष्णु की घोर तपस्या की।
तब खुश होके भगवान ने इन्द्र देव को
बचाया भी और मुक्ति के लिए उपाय भी सुझाया, इसके लिए उन्हें अपना पाप किसी को देना जरुरी था. इन्द्र ने
वृक्ष पानी धरती और औरत को इस बाबत मन लिया, जिससे खुश होके इंद्र ने हर एक को एक विशेष वर दिया।
वृक्ष को पाप का चौथाई भाग दिया जिसके बदले में इन्द्र ने इच्छा जन्म का वर
दिया। इसके बाद जल को पाप का हिस्सा देने उसे बहते रहने या अस्थिर रहने की पीड़ा पर
इन्द्र देव ने उसे अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति प्रदान की।
तीसरा पाप का भाग इन्द्र देव ने भूमि को दिया जिसे स्थिर होने की पीड़ा मिली,
वरदान स्वरूप उन्होंने भूमि से कहा कि उस पर आई
कोई भी चोट हमेशा भर जाएगी।
औरत को भी बाकि बचा चौथाई पाप का भाग मिला जिसके बदले इंद्र ने उसे पुरुषो की
अपेक्षा ज्यादा स-म्भोग सुख मिलने का वार दिया. इसी पाप के कारण औरतो को ऋतुधर्म
की पीड़ा से गुजरना पड़ता है, इस दौरान वो पाप
झेल रही होती है. इसी कारण उन्हें इस समय पूजा अर्चना या किसी तरह का काम करने की
पाबन्दी भी रहती है.
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