आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को माता पार्वती को प्रसन्न
करने के लिए विजया (जया) पार्वती व्रत किया जाता है। इसका वर्णन
भविष्योत्तर पुराण में मिलता है। इस बार यह व्रत 29 जुलाई, बुधवार को है।
इस व्रत के बारे में भगवान विष्णु ने लक्ष्मी को बताया था। धर्म ग्रंथों के
अनुसार, यह व्रत महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस व्रत को करने से
स्त्रियां सौभाग्यवती होती हैं और उन्हें वैधव्य (विधवा) का दु:ख नहीं
भोगना पड़ता। इस व्रत की विधि इस प्रकार है-
व्रत विधि
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को सुबह जल्दी उठकर जरूरी काम
निपटा लें। इसके बाद नहाकर हाथ में जल लेकर जया पार्वती व्रत का संकल्प इस
प्रकार लें-
मैं आनन्द के साथ स्वादहीन अनाज से एकभुक्त (एक समय भोजन) व्रत
करूंगी। मेरे पापों को नष्ट करना व सौभाग्य का वर देना। इसके बाद अपनी
शक्ति के अनुसार सोने, चांदी या मिट्टी से बने बैल पर बैठे शिव-पार्वती की
मूर्ति की स्थापना करें। स्थापना किसी मंदिर या ब्राह्मण के घर पर
वेदमंत्रों से करें या कराएं। इसके बाद इस प्रकार पूजा करें-सबसे पहले कुमकुम, कस्तूरी, अष्टगंध, शतपत्र (पूजा में उपयोग आने वाले पत्ते) व फूल चढ़ाएं। इसके बाद नारियल, दाख, अनार व अन्य ऋतुफल अर्पित करें। विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन करें। माता पार्वती का स्मरण करें व उनकी स्तुति करें, जिससे वे प्रसन्न हों।
अब निवेदन करें कि हे प्रथमे। हे देवी। हे शंकर की प्यारी। मुझ पर कृपा कर यह पूजन ग्रहण करें व मुझे सौभाग्य का वर दें। इस प्रकार निवेदन करने के बाद इस व्रत से संबंधित कथा ब्राह्मण से सुनें। कथा समाप्ति के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं। बाद में स्वयं नमक रहित भोजन करें।
इस प्रकार विजया पार्वती व्रत विधि-विधान से करने से माता पार्वती प्रसन्न होती हैं और हर मनोकामना पूरी करती हैं
विजया पार्वती व्रत की कथा भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को सुनाई थी, जो इस प्रकार है-
किसी समय कौडिन्य नगर में वामन नाम का एक योग्य ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सत्या था। उनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके यहां संतान नहीं होने से वे बहुत दु:खी रहा करते थे। एक दिन नारदजी उनके यहां आएं। उन्होंने नारदजी की सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। तब नारदजी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शंकर माता पार्वती के साथ लिंगरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।
तब ब्राह्मण दंपत्ति ने ढूंढकर उस शिवलिंग की विधि-विधान से पूजा की। इस प्रकार पूजा करने का क्रम चलता रहा और पांच वर्ष बीत गए। एक दिन जब वह ब्राह्मण पूजन के लिए फूल तोड़ रहा था तभी उसे सांप ने काट लिया और वह वहीं जंगल में ही गिर गया। ब्राह्मण जब काफी देर तक घर नहीं गया तो उसकी पत्नी उसे ढूंढने आई। पति को इस हालत में देख वह रोने लगी और वनदेवता व माता पार्वती को स्मरण किया।
ब्राह्मणी की पुकार सुनकर वनदेवता और मां पार्वती चली आईं और ब्राह्मण के मुख में अमृत डाल दिया, जिससे ब्राह्मण उठ बैठा। तब ब्राह्मण दंपत्ति ने माता पार्वती का पूजन किया। माता पार्वती ने उनसे वर मांगने के लिए कहा। तब दोनों ने संतान प्राप्ति के लिए कहा। माता पार्वती ने उन्हें विजया पार्वती व्रत करने के लिए कहा। ब्राह्मण दंपत्ति ने विधि पूर्वक यह व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।
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