16 जुलाई,
गुरुवार को आषाढ़
का अधिक मास
समाप्त हो जाएगा।
इस बार का
अधिक मास बहुत
ही विशेष था,
क्योंकि आषाढ़ का अधिक
मास 19 साल बाद
आया था। इससे
पहले 1996 में यह
संयोग बना था।
ज्योतिषियों के अनुसार
अब 2034 में आषाढ़
का अधिक मास
आएगा। वहीं 2018 में
16 मई से 13 जून
तक ज्येष्ठ का
अधिक मास होगा।
क्यों विशेष
है
अधिक
मास?
हिंदू
धर्म में अधिक
मास को बहुत
ही पवित्र और
पुण्य फल देने
वाला माना गया
है। अधिक मास
को पुरुषोत्तम मास
भी कहते हैं।
इस महीने में
भगवान पुरुषोत्तम की
पूजा करने व
श्रीमद्भागवत की कथाएं
सुनने, मंत्र जाप, तप
व तीर्थ यात्रा
का भी बड़ा
महत्व है। इस
महीने में पवित्र
नदियों में स्नान
करने से मोक्ष
की प्राप्ति होती
है, ऐसी मान्यता
है। अधिक मास
में विवाह, गृह
प्रवेश, यज्ञोपवित जैसे शुभ
कार्य नहीं किए
जाते।
क्यों आता
है
अधिक
मास?
32 महीने,
16 दिन, 1 घंटा 36 मिनट के
अंतराल से हर
तीसरे साल अधिक
मास आता है।
ज्योतिष में चंद्रमास
354 दिन व सौरमास
365 दिन का होता
है। इस कारण
हर साल 11 दिन
का अंतर आता
है जो 3 साल
में एक माह
से कुछ ज्यादा
होता है। चंद्र
और सौर मास
के अंतर को
पूरा करने के
लिए धर्म शास्त्रों
में अधिक मास
की व्यवस्था की
है।
जानिए अधिक
मास
में
क्या
करें-क्या
नहीं
महर्षि
वाल्मीकि ने अधिक
मास के नियमों
के संबंध में
कहा है कि
इस महीने में
गेहूं, चावल, सफेद धान,
मूंग, जौ, तिल,
मटर, बथुआ, शहतूत,
ककड़ी, केला, घी, कटहल,
आम, हर्रे, पीपल,
जीरा, सौंठ, इमली,
सुपारी, आंवला, सेंधा नमक
नहीं खाना चाहिए।
इनके
अलावा मांस, शहद,
चावल का मांड,
चौलाई, उरद, प्याज,
लहसुन, नागरमोथा, गाजर, मूली,
राई, नशे की
चीजें, दाल, तिल
का तेल और
दूषित अन्न का
त्याग करना चाहिए।
तांबे के बर्तन
में गाय का
दूध, चमड़े में
रखा हुआ पानी
और केवल अपने
लिए ही पकाया
हुआ अन्न दूषित
माना गया है।
इसलिए इनका भी
त्याग करना चाहिए।
पुरुषोत्तम
मास में जमीन
पर सोना, पत्तल
पर भोजन करना,
शाम को एक
वक्त खाना, रजस्वला
स्त्री से दूर
रहना और बुरे
लोगों से संपर्क
नहीं रखना चाहिए।
किसी भी व्यक्ति
के बेवजह विवाद
नहीं करना चाहिए।
यदि कोई हमसे
विवाद करना चाहता
हो तो वहां
से चला जाना
चाहिए। देवता, वेद, ब्राह्मण,
गुरु, गाय, साधु-सन्यांसी, स्त्री और
बड़े लोगों की
बुराई नहीं करनी
चाहिए।
इसलिए
अधिक मास को
कहते हैं पुरुषोत्तम
मास
ब्रह्मवैवर्त
पुराण के अनुसार,
जब सर्वप्रथम अधिक
मास की उत्पत्ति
हुई तो वह
स्वामी रहित होने
के कारण देवताओं
व पितरों की
पूजा के लिए
और शुभ कामों
के लिए वर्जित
माना गया। इसी
कारण सभी ओर
उसकी निंदा होने
लगी। निंदा से
दु:खी होकर
अधिक मास भगवान
विष्णु के पास
वैकुण्ठ लोक में
पहुंचा और अपनी
पीड़ा बताई। तब
भगवान विष्णु अधिक
मास को लेकर
गोलोक गए।
वहां
भगवान श्रीकृष्ण मोरपंख
का मुकुट व
वैजयंती माला धारण
कर सोने के
सिंहासन पर बैठे
थे। भगवान विष्णु
ने अधिक मास
को श्रीकृष्ण के
चरणों में नतमस्तक
करवाया व कहा
कि यह अधिक
मास वेद-शास्त्र
के अनुसार पुण्य
कर्मों के लिए
अयोग्य माना गया
है, इसीलिए सभी
इसकी निंदा करते
हैं। तब श्रीकृष्ण
ने कहा कि
अब से कोई
भी अधिक मास
की निंदा नहीं
करेगा, क्योंकि अब से
मैं इसे अपना
नाम देता हूं।
यह
जगत में पुरुषोत्तम
मास के नाम
से विख्यात होगा।
मैं इस मास
का स्वामी बन
गया हूं। जिस
परमधाम गोलोक को पाने
के लिए ऋषि
तपस्या करते हैं,
वही दुर्लभ पद
पुरुषोत्तम मास में
स्नान, पूजन, अनुष्ठान व
दान करने वाले
को सरलता से
प्राप्त हो जाएंगे।
इस प्रकार अधिक
मास पुरुषोत्तम मास
के नाम से
प्रसिद्ध हुआ।
16 को
खत्म होगा अधिक
मास, 2018 में आएगा
ये पवित्र महीना
भगवान
पुरुषोत्तम की भक्ति
का समय है
अधिक मास
धर्मग्रंथों
के अनुसार, अधिक
मास को भगवान
पुरुषोत्तम ने अपना
नाम दिया है।
इसलिए इस मास
में भगवान पुरुषोत्तम
की आराधना करने
का विशेष महत्व
है। इस महीने
में सुबह सूर्योदय
से पहले उठकर
शौच, स्नान, संध्या
आदि करके भगवान
का स्मरण करना
चाहिए और पुरुषोत्तम
मास के नियम
ग्रहण करने चाहिए,
जो इस प्रकार
हैं-
1. पुरुषोत्तम
मास में श्रीमद्भागवत
का पाठ करने
से शुभ फल
प्राप्त होते हैं।
2. इस
मास में तीर्थों,
घरों व मंदिरों
में जगह-जगह
भगवान की कथा
होनी चाहिए।
3. भगवान
की कृपा से
देश तथा विश्व
का मंगल हो
व गाय, ब्राह्मण
और धर्म की
रक्षा हो, इसके
लिए व्रत-नियम
आदि का आचरण
करते हुए दान,
पुण्य और भगवान
की पूजा करनी
चाहिए।
4. पुरुषोत्तम
मास के संबंध
में धर्मग्रंथों में
लिखा है-
येनाहमर्चितो
भक्त्या मासेस्मिन् पुरुषोत्तमे।
धनपुत्रसुखं
भुकत्वा पश्चाद् गोलोकवासभाक्।।
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