हिंदू
धर्म में चातुर्मास
(देवशयनी एकादशी से देवउठनी
एकादशी तक का
समय) का विशेष
महत्व है। चातुर्मास
में मांगलिक कार्य
नहीं किए जाते
और धार्मिक कार्यों
पर अधिक ध्यान
दिया जाता है।
चातुर्मास के अंतर्गत
सावन, भादौ, अश्विन
व कार्तिक मास
आता है। इस
बार चातुर्मास का
प्रारंभ 27 जुलाई, सोमवार से
हो रहा है।
ऐसा
माना जाता है
कि इस दौरान
भगवान विष्णु विश्राम
करते हैं। हमारे
धर्म ग्रंथों में
चातुर्मास के दौरान
कई नियमों का
पालन करना जरूरी
बताया गया है
तथा उन नियमों
का पालन करने
से मिलने वाले
फलों का भी
वर्णन किया गया
है। जानिए चातुर्मास
में कौन से
कार्य करना चाहिए-
1. शरीर
की रोगप्रतिरोधक क्षमता
बढ़ाने व पाचन
तंत्र को ठीक
रखने के लिए
पंचगव्य (गाय का
दूध, गाय का दही, गाय का घी,
गाय का गोमूत्र, गाय का गोबर) का सेवन
करें।
2. पापों
के नाश व
पुण्य प्राप्ति के
लिए एक भुक्त
(एक समय भोजन),
अयाचित (बिना मांगा)
भोजन या उपवास
करने का व्रत
ग्रहण करें।
3. तेल
से बनी चीजों
का सेवन न
करें।
4. चातुर्मास
में सभी प्रकार
के मांगलिक कार्य
जहां तक हो
सके, न करें।
5. पलंग
पर सोना, पत्नी
का संग करना,
झूठ बोलना, मांस,
शहद, गुड़, हरी
सब्जी, मूली एवं
बैंगन भी नहीं
खाना चाहिए।
ये है
चातुर्मास
वैज्ञानिक
व
धार्मिक
महत्व
चातुर्मास
न केवल धार्मिक
दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण
है बल्कि इसका
वैज्ञानिक महत्व भी है।
इस समय कुछ
विशेष कामों को
करने के लिए
मना किया जाता
है, इसका कारण
भी वैज्ञानिक है।
ये है चातुर्मास
का महत्व-
वैज्ञानिक महत्व
चातुर्मास
में मूलत: बारिश
का मौसम होता
है। इस समय
बादल और वर्षा
के कारण सूर्य
का प्रकाश सीधे
पृथ्वी तक नहीं
पहुंच पाता, यही
देवताओं के शयन
का प्रतीक है।
इस समय शरीर
के भोजन पचाने
की शक्ति भी
कम हो जाती
है। बारिश के
कारण विभिन्न प्रकार
के सूक्ष्मी जीव
उत्पन्न हो जाते
हैं, इस समय
हमारे शरीर की
रोग प्रतिरोधक क्षमता
कम होने से
ये आसानी से
हमें रोगी बना
देते हैं। इसके
कारण हमारे शरीर
में कमजोरी आ
जाती है। इसलिए
हमारे विद्वानों ने
इस समय के
लिए कुछ विशेष
नियम-संयम बनाए
हैं।
No comments:
Post a Comment