शिर्डी के साईं
बाबा को भले
ही शंकराचार्य स्वरूपानंद
सरस्वती मुसलमान फकीर बता
रहे हों पर
वास्तविकता में साईं
बाबा हिंदू थे।
यहीं नहीं उन्हें
वेदों का भी
अच्छी जानकारी थी।
वह जिस मस्जिद
में रहते थे
वहां दीवाली का
त्योहार बड़ी ही
धूमधाम से मनाते
थे। बाबा रोज
शिर्डी में लोगों
के घर और
दुकानों पर भीख
मांगने जाया करते
थे। शाम के
समय कुछ दुकानों
पर वह भीख
में तेल मांगते
थे। एक बार
दीवाली के दिन
शिर्डी के दुकान
वालों ने उन्हें
तेल देने से
मना कर दिया।
बाबा मस्जिद आ
गए उन्होंने देखा
की जिस बर्तन
में वह तेल
रखते थे उसमें
बिलकुल भी तेल
नहीं है। उन्होंने
उस बर्तन में
पानी डाला और
तेल मिला पानी
पी गए। थोड़ी
देर बाद उन्होंने
वह पानी वापस
उस बर्तन में
उगल दिया और
दीयों में डाल
कर फिर दिए
जला दिए। ये
दिए रातभर जलते
रहे।
ब्राह्मण परिवार में
हुआ
था
जन्म
साईं बाबा की
जन्मतिथि, जन्म स्थान
और माता-पिता
के बारे में
कोई पक्की जानकारी
नहीं है। उस
समय उनके साथ
रहने वाले लोगों
ने इस संबंध
में बहुत छानबीन
की। बाबा से
तथा अन्य लोगों
से भी इस
विषय में पूछताछ
की गई, परन्तु
कोई सही जानकारी
नहीं मिल सकी।
बाबा के जीवन
पर लिखी गई
जीवन कथा 'श्री
साईं सच्चरित्र' है
जिसे श्री अन्ना
साहेब दाभोलकर ने
सन 1914 में लिखा
है। इसमें उन्होंने
लिखा है कि
एक बार बाबा
ने महाराष्ट्र के
परभणी जिले के
पाथरी गांव से
आए लोगों से
कुछ पुराने लोगों
के बारे में
पूछा था। वह
कई बार लोगों
से कहा करते
थे कि वह
एक ब्राह्मण परिवार
में जन्में फकीर
हैं वह कैसे
किसी का धर्मभ्रष्ट
कर सकते हैं।
शिर्डी ऐसे बन
गया
तीर्थस्थल
अहमदनगर जिले के
कोपरगांव में शिर्डी
नामक जगह है।
शिर्डी में लोगों
ने साईं बाबा
को पहली बार
सन् 1854 में नीम
के पेड़ के
नीचे बैठे देखा।
कुछ समय बाद
बाबा शिर्डी छोड़कर
किसी अज्ञात जगह
पर चले गए
और चार साल
बाद 1858 में लौटकर
चांद पाटिल के
संबंधी की शादी
में बरात के
साथ फिर शिर्डी
आए। इस बार
वह खंडोबा के
मंदिर के सामने
ठहरे थे। इसके
बाद के साठ
साल तक 1858 से
1918 तक बाबा शिर्डी
में रहे। और
शिर्डी विश्व भर में
प्रसिद्ध तीर्थस्थल बन गया।
सभी जाति के
लोग
आते
थे
बाबा के भक्तों
में सभी जाति-धर्म-पंथ
के लोग शामिल
हैं। जहां हिन्दू
बाबा के चरणों
में हार-फूल
चढ़ाते, समाधि पर दूब
रख अभिषेक करते
हैं, वहीं मुस्लिम
बाबा की समाधि
पर चादर चढ़ा
सब्जा चढ़ाते हैं।
कुल मिलाकर बाबा
की शिर्डी सर्वधर्म
समभाव के धार्मिक
सहअस्तित्व का महत्वपूर्ण
स्थान है, लेकिन
यहां आने वाले
भक्त तो इन
सबके परे केवल
मन में उनके
प्रति श्रद्धा और
विश्वास के चलते
खिंचे चले आते
हैं। साई बाबा
ने अपनी जिंदगी
में समाज को
दो अहम संदेश
दिए हैं- 'सबका
मालिक एक' और
'श्रद्धा और सबूरी'।
लोकमान्य तिलक भी
गए
थे
बाबा
से
मिलने
सन् 1858 में प्रथम
स्वाधीनता संग्राम की ज्वाला
भारत के कोने-कोने में
भड़क रही थी।
कहा जाता है
कि उस समय
बाबा से मिलने
आने वाले स्वतंत्रता
संग्राम सेनानियों में से
एक बड़े नेता
लोकमान्य तिलक भी
थे। वह स्वतंत्रता
संग्राम सेनानियों को अपने
देश की सेवा
करने के लिए
प्रोत्साहित करते थे।
मूर्ति की पूजा
भी
करते
थे
साईं
बाबा
जितने भी हिंदू
और मुसलमान संत
हुए हैं उनमें
शिर्डी के साईं
बाबा का स्थान
अलग है। वह
इसलिए कि उन्होंने
हिन्दू परिवार में जन्म
लेकर भी अपनी
साधना का केन्द्र
शिर्ड़ी की टूटी–फूटी मस्जिद
को बनाया, जिसके
कारण लोगों को
आज भी यह
संदेह है कि
वह हिन्दू नहीं
मुसलमान थे। वह
मन्दिर में जाकर
हिंदुओं की तरह
मूर्ति पूजा भी
करते थे। वह
हिन्दू त्योहारों और पर्वों
को भी इसी
धूमधाम से मनाते
थे और खुशी
से के साथ
वह मुस्लिम त्योहारों
को मनाया करते
थे।
भोजन में सभी प्राणियों का हिस्सा
शिर्डी के
लोग शुरू
में साईं
बाबा को
पागल समझते
थे। धीरे-धीरे
उनकी शक्ति
और गुणों
को जानने
के बाद
भक्तों की
संख्या बढ़ती
गई। साईं
बाबा शिर्डी
के केवल
पांच परिवारों
से रोज
दिन में
दो बार
भिक्षा मांगते
थे। वे
टीन के
बर्तन में
तरल पदार्थ
और कंधे
पर टंगे
हुए कपड़े
की झोली
में रोटी
और ठोस
पदार्थ इकट्ठा
किया करते
थे। सभी
सामग्रियों को
वे द्वारिका
माई लाकर
मिट्टी के
बड़े बर्तन
में मिलाकर
रख देते
थे। कुत्ते,
बिल्लियाँ, चिड़िया
निःसंकोच आकर
उस खाने
का कुछ
अंश खा
लेते थे,
बची हुए
भिक्षा को
साईं बाबा
भक्तों के
साथ मिल
बाँट कर
खाते थे।
कुत्ते का नहीं
साईं
का
अनादर
एक बार साईं
के एक भक्त
ने साईं बाबा
को भोजन के
लिए घर पर
बुलाया। निश्चित समय से
पूर्व ही साईं
बाबा कुत्ते का
रूप धारण करके
भक्त के घर
पहुंच गए। साईं
के भक्त ने
अनजाने में चूल्हे
में जलती हुई
लकड़ी से कुत्ते
को मारकर भगा
दिया। जब साईं
बाबा नहीं आए
तो उनका भक्त
घर पर जा
पहुंचा। साईं बाबा
मुस्कुराए और कहा,
"मैं तो तुम्हारे
घर भोजन के
लिए आया था
लेकिन तुमने जलती
हुई लकड़ी से
मारकर मुझे भगा
दिया।" साईं का
भक्त अपनी भूल
पर पछताने लगा
और माफी मांगी।
साईं बाबा ने
स्नेह पूर्वक उसकी
भूल को क्षमा
कर दिया।
उदी की महिमा
से
संतान
सुख
लक्ष्मी नामक एक
स्त्री संतान सुख के
लिए तड़प रही
थी। एक दिन
साईं बाबा के
पास अपनी विनती
लेकर पहुंच गई।
साईं ने उसे
उदी यानी भभूत
दिया और कहा
आधा तुम खा
लेना और आधा
अपने पति को
दे देना। लक्ष्मी
ने ऐसा ही
किया। निश्चित समय
पर लक्ष्मी गर्भवती
हुई। साईं के
इस चमत्कार से
वह साईं की
भक्त बन गयी
और जहां भी
जाती साईं बाबा
के गुणगाती। साईं
के किसी विरोधी
ने लक्ष्मी के
गर्भ को नष्ट
करने के लिए
धोखे से गर्भ
नष्ट करने की
दवाई दे दी।
इससे लक्ष्मी को
पेट में दर्द
एवं रक्तस्राव होने
लगा। लक्ष्मी साईं
के पास पहुंचकर
साईं से विनती
करने लगी। साईं
बाबा ने लक्ष्मी
को उदी खाने
के लिए दिया।
उदी खाते ही
लक्ष्मी का रक्तस्राव
रूक गया और
लक्ष्मी को सही
समय पर संतान
सुख प्राप्त हुआ।
शहरा के दिन
छोड़
दी
दुनिया
साईं बाबा अपनी
घोषणा के अनुरूप
15 अक्टूबर, 1918 को विजयादशमी
के विजय-मुहूर्त्त में शारीरिक
सीमा का उल्लंघन
कर निजधाम प्रस्थान
कर गए. इस
प्रकार विजयादशमी बन गया
उनका महासमाधि पर्व।
शिर्डी के साईं
मंदिर का द्वारका
माई वह स्थान
है जहां साईं
बाबा भोजन बनाते
थे, वहीं पर
धूनी रमाते थे
और उसी धूनी
का प्रसाद लोगों
को देते थे।
धूनी की भभूत
से लोगों के
दुःख-दर्द दूर
होते थे और
वह स्थान जहां
बाबा का समाधि
मंदिर है। दोनों
स्थान पास-पास
है।
मिलती है शिक्षा
साईं बाबा की
चमत्कारिक कहानियों के पीछे
जीवन से जुड़ी
कोई न कोई
शिक्षा या मर्म
छिपा है। साईं
बाबा सशरीर भले
ही धरती पर
नहीं हैं लेकिन
सच्चे भक्तों को
हमेशा यह एहसास
होता है कि
साईं बाबा उनके
साथ हैं। साईं
की दर से
कभी कोई खाली
हाथ नहीं लौटता।
समाधि लेने के
पहले भी बाबा
इसी बटुए में
हाथ डालकर अपने
भक्तों को सोने-चांदी के सिक्के
देकर उनके दुखों
को दूर किया
करते थे। साईं
बाबा की इस
अनमोल धरोहर को
आज भी संभाल
कर रखा गया
है।
अंग्रेज सरकार ने
कराई
थी
जांच
उस समय अंग्रेज
शासकों ने साईं
बाबा के इस
चमत्कार की जांच
के आदेश भी
दिए थे, लेकिन
वह चमत्कार आज
भी एक पहेली
बना हुआ है।
शिर्डी में आज
भी हर गुरुवार
को साईं की
पालकी निकलती है,
जिसके दर्शन करने
लिए हजारों भक्तों
की भीड़ लगती
है। सामधि लेने
से पहले बाबा
अपनी लाठी से
छूकर भक्तों की
सारी तकलीफें दूर
किया करते थे
और जब भक्तों
के दुःख से
बाबा खुद निढ़ाल
हो जाते तो
अपनी चिलम जला
लेते थे। आज
भी साईं की
पालकी जब चावड़ी
पहुंच जाती है
तो उनको चिलम
चढ़ाई जाती है।
ये चिलम सिर्फ
श्रद्धा और आस्था
का चढ़ावा ही
नहीं है, बल्कि
साई के चमत्कारों
से भी जुड़ी
हुई है। साईं
की पालकी की
इन खास रस्मों
के दर्शन करने
की मनाही किसी
को नहीं है।
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