Wednesday, 4 November 2015

दीपावली पूजा के समय कई छोटी-छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण परंपराओं का पालन किया जाता है



11 नवंबर को दीपावली है और इस दिन लक्ष्मी की पूजा की जाएगी। पूजा के समय कई छोटी-छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण परंपराओं का पालन किया जाता है, जैसे कलाई पर धागा बांधते समय चावल पीछे फेंकना, तिलक लगाना, तिलक लगाते समय रूमाल सिर पर रखना, कर्पूर से आरती करना आदि। यहां जानिए ऐसी ही परंपराओं के वैज्ञानिक कारण और धार्मिक पक्ष...

पूजा में कलाई पर धागा बांधें
पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन में पूजा करवाने वाले ब्राह्मण हमारी कलाई पर मौली (एक धार्मिक धागा) बांधते हैं। इसे रक्षासूत्र, कलेवा या मौली कहा जाता है। इस मान्यता का सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारण भी है। मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश और तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है।
ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से बल मिलता है और शिवजी की कृपा से बुराइयों का अंत होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी कृपा से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।
विज्ञान की दृष्टि से मौली बांधने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। जब यह धागा बांधा जाता है तो इससे कलाई पर हल्का सा दबाव बनता है। इस दबाव से त्रिदोष- वात, पित्त तथा कफ को नियंत्रित होता है। रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था।
कलाई पर धागा बांधने के बाद चावल पीछे फेंकें
पूजा में कलाई पर मौली यानी धागा बांधते समय हाथ में चावल दिए जाते हैं। धागा बांधने के बाद उन चावलों को पीछे फेंक दिया जाता है। इस प्रकार चावल पीछे फेंकने का भाव यह होता है कि चावल के साथ ही हमारी परेशानियां भी दूर हो जाएं। धागा बंधवाने वाले व्यक्ति के सभी दुख खत्म हो जाते हैं और कलाई पर मंत्रों के साथ बंधा हुआ धागा व्यक्ति की रक्षा करता है।

तिलक लगाएं
किसी भी पूजा में तिलक लगाना महत्वपूर्ण परंपरा है। शास्त्रों के अनुसार हमें सूने माथे के साथ भगवान के सामने नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यह शुभ नहीं माना जाता। माथे पर तिलक लगाना पूजा के लिए शुभ शकुन होता है। तिलक माथे पर या दोनों भौहों के बीच लगाया जाता है। तिलक कुमकुम या चंदन जैसी पवित्र चीजों से लगाया जाता है।
इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि तिलक लगाने से दिमाग शांत रहता है और मस्तिष्क को शीतलता मिलती है। जब दिमाग शांत रहता है तो हम पूजन कर्म पूरी भक्ति और एकाग्रता से कर पाते हैं। इसीलिए पूजन के प्रारंभ में ही तिलक लगाया जाता है। तिलक लगाने वाले स्थान पर आज्ञा चक्र होता है और इस चक्र को संतुलित रखने के लिए भी तिलक लगाना महत्वपूर्ण है। इससे बुद्धि का विकास होता है और थकावट दूर होती है।

तिलक लगवाते समय सिर पर रूमाल रखें
पूजा करते समय या तिलक लगवाते समय सिर पर हाथ या रूमाल रखा जाता है। यह भगवान और तिलक लगाने वाले व्यक्ति के लिए सम्मान देना का एक तरीका है। पूजा करते समय कपड़ा सिर पर इसलिए भी रखा जाता है, ताकि पूजन से मिलने वाली ऊर्जा सिर से आकाश की ओर न निकल जाए। सिर मध्य भाग में दशम द्वार होता है, जो कि बहुत ही संवेदनशील होता है। वातावरण में मौजूद सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा का सीधा असर दशम द्वार से व्यक्ति पर होता है। दशम द्वार की सुरक्षा के लिए सिर पर रूमाल रखा जाता है।

आरती में कर्पूर जलाएं
पूजा में किए जाने वाले सभी कर्मों का संबंध धर्म के साथ ही हमारे स्वास्थ्य से भी है। पूजा में आरती करना भी जरूरी क्रिया है। आरती में कर्पूर भी जलाया जाता है। कर्पूर जलाने की परंपरा के पीछे भी कई कारण मौजूद हैं। कर्पूर तीव्र उड़नशील पदार्थ है। यह सफेद रंग का होता है। इसमें तीखी गंध होती है।
शास्त्रों के अनुसार कर्पूर जलाने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। जिस घर में नियमित रूप से कर्पूर जलाया जाता है, वहां पितृदोष या किसी अन्य ग्रह दोष का असर नहीं होता है। कर्पूर जलाने से वातावरण सकारात्मक, पवित्र और सुगंधित होता है। इसकी महक से हमारे विचारों में भी सकारात्मकता आती है।
कर्पूर जलाने का वैज्ञानिक महत्व भी है। कर्पूर एक सुगंधित वस्तु है और इसे जलने पर कर्पूर की महक वातावरण में तेजी से फैल जाती है। इसकी महक से वातावरण में मौजूद कई सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। कर्पूर जलाने से वातावरण की शुद्ध हो जाता है।
यदि आप रात को सोने से पहले कर्पूर जलाकर सोएंगे तो इससे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होते हैं। ऐसा करने पर अनिद्रा की शिकायत दूर हो जाती है, बुरे सपने नहीं आते हैं।

कुश के आसन पर बैठें
पूजा में बैठने के लिए विशेष प्रकार के आसन का उपयोग किया जाता है। यह कुश का बना होता है। कुश एक प्रकार की घास है। इस घास से बने आसन ही पूजा के लिए श्रेष्ठ बताए गए हैं। शास्त्रों के अनुसार कुश से बने आसन पर बैठकर पूजा करने से श्रेष्ठ फलों की प्राप्ति बहुत ही जल्दी होती है।
इस संबंध में वैज्ञानिक मान्यता यह है कि कुश ऊर्जा का कुचालक है यानी कुश ऊर्जा को एक ओर से दूसरी ओर प्रवाहित नहीं होने देता है। पूजा के समय लंबे समय तक बैठे रहने से हमारे शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। यदि हम किसी और आसन पर बैठते हैं तो यह ऊर्जा धरती में उतर जाती है, जबकि कुश के आसन पर बैठकर पूजा करने से यह ऊर्जा हमारे शरीर में ही बनी रहती है। इस ऊर्जा के प्रभाव से शरीर को शक्ति प्राप्त होती है और चेहरे पर तेज बढ़ता है। इसीलिए कुश के आसन पर बैठकर ही पूजा करनी चाहिए।

दीपावली पर लक्ष्मी के साथ गणेशजी की पूजा भी जरूर करें
दीपावली पर लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन लक्ष्मी की पूजा के साथ ही श्रीगणेश की पूजा भी अनिवार्य रूप से करनी चाहिए। श्रीगणेश प्रथम पूज्य हैं और इनकी पूजा के बिना कोई मांगलिक काम की पूरा नहीं हो सकता है। गणेशजी को शिवजी ने प्रथम पूज्य होने वरदान दिया था, इसी कारण इनकी पूजा सबसे पहले की जाती है।
दीपावली पर लक्ष्मी को पूजने से तभी धन-धान्य की प्राप्ति हो सकती है, जब श्रीगणेश को भी पूजा जाए। लक्ष्मी धन देती हैं और गणेशजी सुख-समृद्धि देते हैं। इसी वजह से सभी प्रकार के पूजन कर्म की शुरुआत श्रीगणेश की पूजा के साथ ही होती है। ताकि घर-परिवार में सुख बना रहे।

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