माघ मास की अमावस्या को माघी तथा मौनी अमावस्या कहते हैं। इस पवित्र तिथि
पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरण पूर्वक स्नान, दान करने तथा व्रत
रखने का विशेष महत्व है। इस बार यह अमावस्या 8 फरवरी, सोमवार को है। सोमवार
को मौनी अमावस्या होने से इसका महत्व और भी अधिक हो गया है।
मान्यताओं के अनुसार, मौनी व सोमवती अमावस्या के योग में त्रिवेणी अथवा गंगातट पर स्नान, दान करने की अपार महिमा है। मौनी अमावस्या पर नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नान करके तिल, तिल के लड्डू, आंवला तथा कंबल आदि का दान करना चाहिए। साथ ही साधु, महात्मा तथा ब्राह्मणों के के लिए अग्नि प्रज्वलित करना चाहिए-
मान्यताओं के अनुसार, मौनी व सोमवती अमावस्या के योग में त्रिवेणी अथवा गंगातट पर स्नान, दान करने की अपार महिमा है। मौनी अमावस्या पर नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नान करके तिल, तिल के लड्डू, आंवला तथा कंबल आदि का दान करना चाहिए। साथ ही साधु, महात्मा तथा ब्राह्मणों के के लिए अग्नि प्रज्वलित करना चाहिए-
तैलमामलकाश्चैव तीर्थे देयास्तु नित्यश:।
तत: प्रज्वालयेद्वह्निं सेवनार्थे द्विजन्मनाम्।।
कंबलाजिनरत्नानि वासांसि विविधानि च।
चोलकानि च देयानि प्रच्छादपटास्तथा।।
इस दिन गुड़ में काला तिल मिलाकर लड्डू बनाना चाहिए तथा उसे लाल कपड़े में बांधकर ब्राह्मणों को देना चाहिए। साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए। स्नान, दान के अलावा इस दिन पितृ श्राद्ध करने का भी विधान है।
तत: प्रज्वालयेद्वह्निं सेवनार्थे द्विजन्मनाम्।।
कंबलाजिनरत्नानि वासांसि विविधानि च।
चोलकानि च देयानि प्रच्छादपटास्तथा।।
इस दिन गुड़ में काला तिल मिलाकर लड्डू बनाना चाहिए तथा उसे लाल कपड़े में बांधकर ब्राह्मणों को देना चाहिए। साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए। स्नान, दान के अलावा इस दिन पितृ श्राद्ध करने का भी विधान है।
मन पर संयम रखना सीखाती है मौनी अमावस्या
मौनी अमावस्या पर व्रत करने वाले को पूरे दिन मौन व्रत का पालन करना
होता है इसलिए इसे योग पर आधारित व्रत भी कहते हैं। मौन का अर्थ समझा जाता
है कि चुप रहना या नहीं बोलना। किंतु मौन का सही अर्थ होता है - वाणी का
संयम के साथ उपयोग, आवश्यकता अनुसार बोलना, झूठ, कटु बोल न बोलना।
इस प्रकार वाणी का संयम के साथ उपयोग करने की प्रवृत्ति को मौन कहते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए मौन रखना आसान नहीं होता। यदि मानव मन पर संयम न हो तो व्यक्ति असफलता और अवनति की ओर जाता है। इसलिए मानव मन पर नियंत्रण करने का सबसे उचित तरीका है- मौन। शास्त्रों में भी वर्णित है कि मुख से ईश्वर का जप करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन ही मन में भगवान का नाम लेने से मिलता है।
मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। चूंकि चन्द्रमा को मन का स्वामी माना गया है और अमावस्या को चन्द्र दर्शन नहीं होते, जिससे इस दिन मन:स्थिति कमजोर होती है। अत: मौन व्रत कर मन को संयम में रखते हुए दान-पुण्य का विधान बनाया गया है।
इस प्रकार वाणी का संयम के साथ उपयोग करने की प्रवृत्ति को मौन कहते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए मौन रखना आसान नहीं होता। यदि मानव मन पर संयम न हो तो व्यक्ति असफलता और अवनति की ओर जाता है। इसलिए मानव मन पर नियंत्रण करने का सबसे उचित तरीका है- मौन। शास्त्रों में भी वर्णित है कि मुख से ईश्वर का जप करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन ही मन में भगवान का नाम लेने से मिलता है।
मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। चूंकि चन्द्रमा को मन का स्वामी माना गया है और अमावस्या को चन्द्र दर्शन नहीं होते, जिससे इस दिन मन:स्थिति कमजोर होती है। अत: मौन व्रत कर मन को संयम में रखते हुए दान-पुण्य का विधान बनाया गया है।
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