हिंदू धर्म में दाह संस्कार की परंपरा है। शास्त्रों और पुराणों में भी इसका उल्लेख है। आखिर क्यों किया जाता है दाह संस्कार। जानिए इससे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें.....
अंतिम संस्कार के समय एक छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे शव की परिक्रमा की जाती है और इसे पीछे की ओर पटककर फोड़ दिया जाता है। इस नियम के पीछे एक दार्शनिक संदेश छुपा है। कहते हैं कि जीवन एक छेद वाले घड़े की तरह है जिसमें आयु रूपी पानी हर पल टपकता रहता है और अंत में सब कुछ छोड़कर जीवात्मा चली जाता है और घड़ा रूपी जीवन समाप्त हो जाता। इस रीति के पीछे मरे हुए व्यक्ति की आत्मा और जीवित व्यक्ति दोनों का एक-दूसरे से मोह भंग करना भी उद्देश्य होता है।
गरूड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु से तेरह दिन तक जो पिंडदान किया जाता है, उससे एक कर्मों का फल भोगने वाला अंगूठे के बराबर का शरीर तैयार होता है जो वैसा ही दिखता है जैसा मरा हुआ व्यक्ति होता है। इस शरीर को ही यम के दूत कर्मों के अनुसार, स्वर्ग या नर्क ले जाते हैं। इसी कारण से मृत्यु के बाद तेरह दिन तक श्राद्ध और पिंड दान किया जाता है।
-हिंदू धर्म में जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कार बताए गए हैं। इनमें
आखिरी यानी सोलहवां संस्कार है मृत्यु के बाद होने वाले संस्कार।
जिनमें व्यक्ति की अंतिम विदाई, दाह संस्कार के रीति-रिवाज शामिल हैं।
- दाह संस्कार से जुड़ा एक और बड़ा नियम है कि व्यक्ति की मृत्यु
अगर रात में या शाम ढलने के बाद होती है तो उनका अंतिम संस्कार सुबह
सूर्योदय से लेकर शाम सूर्यास्त होने से पहले करना चाहिए।
- सूर्यास्त होने के बाद शव का दाह संस्कार करना शास्त्र विरुद्ध माना गया है। इसके पीछे कई कारण हैं।
- शास्त्रों का एक मत यह भी है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने
से मृतक व्यक्ति की आत्मा को परलोक में कष्ट भोगना पड़ता है और अगले जन्म
में उसके किसी अंग में दोष हो सकता है।
- एक मान्यता यह भी है कि सूर्यास्त के बाद स्वर्ग का द्वार बंद हो जाता है और नर्क का द्वार खुल जाता है।
परिक्रमा के बाद क्यों फोड़ दी जाती है मटकी....
अंतिम संस्कार के समय एक छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे शव की परिक्रमा की जाती है और इसे पीछे की ओर पटककर फोड़ दिया जाता है। इस नियम के पीछे एक दार्शनिक संदेश छुपा है। कहते हैं कि जीवन एक छेद वाले घड़े की तरह है जिसमें आयु रूपी पानी हर पल टपकता रहता है और अंत में सब कुछ छोड़कर जीवात्मा चली जाता है और घड़ा रूपी जीवन समाप्त हो जाता। इस रीति के पीछे मरे हुए व्यक्ति की आत्मा और जीवित व्यक्ति दोनों का एक-दूसरे से मोह भंग करना भी उद्देश्य होता है।
क्यों करते हैं मुंडन
अंतिम संस्कार में दाह संस्कार के बाद सिर मुंडाने का नियम है।
इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही कारण है। धार्मिक कारण यह माना
जाता है कि सिर मुंडवाकर मृत व्यक्ति की आत्मा के प्रति श्रद्धा
व्यक्त किया जाता है। बाल मनुष्य का श्रृंगार माना जाता है, सिर
मुंडवाना शोक का भी प्रतीक माना जाता है, इसलिए जिस परिवार में व्यक्ति
की मृत्यु होती है वह सिर मुंडवाते हैं।
पिंड दान
गरूड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु से तेरह दिन तक जो पिंडदान किया जाता है, उससे एक कर्मों का फल भोगने वाला अंगूठे के बराबर का शरीर तैयार होता है जो वैसा ही दिखता है जैसा मरा हुआ व्यक्ति होता है। इस शरीर को ही यम के दूत कर्मों के अनुसार, स्वर्ग या नर्क ले जाते हैं। इसी कारण से मृत्यु के बाद तेरह दिन तक श्राद्ध और पिंड दान किया जाता है।
अकाल मृत्यु पर....
शास्त्रों में बताया गया है कि जिनकी अकाल मृत्यु हुई है और शव दाह
संस्कार के लिए नहीं उपलब्ध हो, तब भी उनका दाह संस्कार किया जाना
चाहिए। इसके लिए शास्त्रों में यह खास व्यवस्था है।
कुश'
'कुश' एक प्रकार का घास है, जिसका पुतला बनाकर दाह संस्कार करना
चाहिए। ये उनके लिए है, जिनका शव नहीं मिल पाता। इस प्रकार दाह संस्कार
करने से व्यक्ति की आत्मा को शांति मिल जाती है।
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