Thursday, 11 February 2016

कृष्ण के हाथ में बांसुरी का मतलब

 बांसुरी का मतलब
कृष्ण और मुरली एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। मुरली के बिना श्री कृष्ण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।उनकी मुरली के नाद रूपी ब्रह्म ने सम्पूर्ण सृष्टि को आलोकित और सम्मोहित किया। दरअसल, कृष्ण की बांसुरी उनके स्वभाव की मधुरता का प्रतीक है। कृष्ण के हाथ में बांसुरी का मतलब जीवन में कै सी भी घड़ी आए हमें घबराना नहीं चाहिए। भीतर से शांति हो तो संगीत जीवन में उतरता है।
ऐसे ही अगर भक्ति पाना है तो अपने भीतर शांति कायम करने का प्रयास करें। साथ ही, शास्त्रों के अनुसार कृष्ण के बचपन के अलावा और कहीं उनके बांसुरी वादन का उल्लेख नहीं मिलता है। कृष्ण की बांसुरी प्रेम, कलात्मकता व रचनात्मकता का प्रतीक है। इसलिए कृष्ण का बांसुरी वादन इस तरफ भी इशारा करता है कि बचपन में बच्चों की कलात्मकता व रचनात्मकता पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे उनके मन में संवेदनाएं उत्पन्न होती है और उनका सर्वांगिण विकास होता है।
 
मोर से ब्रह्मचर्य की शिक्षा
मोर को चिर-ब्रह्मचर्य युक्त प्राणी समझा जाता है। इसलिए प्रेम में ब्रह्मचर्य की महान भावना को समाहित करने के प्रतीक रूप में कृष्ण मोर पंख धारण करते हैं। मोर मुकुट का गहरा रंग दुःख और कठिनाइयों, हल्का रंग सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
 माखन व मिश्री से सीखें घुल मिल जाना
श्रीकृष्ण को माखन मिश्री बहुत ही प्रिय है। मिश्री का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि जब इसे माखन में मिलाया जाता है, तो उसकी मिठास माखन के कण-कण में घुल जाती है। उसके हर हिस्से में मिश्री की मिठास समा जाती है। मिश्री युक्त माखन जीवन और व्यवहार में प्रेम को अपनाने का संदेश देता है। यह बताता है कि प्रेम में किस तरह घुल- मिल जाना चाहिए।

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